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कितने ख़ुदा

ओ खानाबदोश ख़ुदा, तुु मन्दिर में भी रहता तुु मस्जिद में भी रहता तु गिरजा में भी रहता किन्तु ना तु मस्जिद में मिलता ना मंदिर में मिलता ना गिरजा में मिलता है। तु टुकडों में, रंगो में बँटा, ख़ुद से ही जुदा हैै। तुझे पता है? आज फिर, तेरे दर के सीढ़ियों पर बैठ भीख माँगता एक ग़रीब फकीर, जिसे ना पत्थर के ख़ुदा ने दिया और ना ही हाड़ के ख़ुदा ने, रात पाले से ठिठुर मर गया कल से सीढ़ियों पर नहीं दिखेगा, उसके पास कम्बल नहीं था मेरे पास ख़ुदा नहीं है। जाने यहाँ फिर भी कितने ख़ुदा हैं! 

प्रेम

हम पथिक हैं, चलते जाएँगे अनवरत, तुम तक पहुँचने को प्रतीक्षारत, पर मिलना तुमसे, ना हो सकेगा कभी, क्योंकि तुम मंज़िल नहीं कोई, तुम पथ हो, जिसका अन्त नहीं कोई।

तुम्हारे बाद

अब कितना कुछ नहीं होगा! रात के सन्नाटे को चीरती तुम्हारी पुकार नहीं होगी, फर्श पर तुम्हारे गीले चप्पलों के निशाँ, गलतियों पर तुम्हारी डाँट नहीं होगी! बचपन में जब बिजली नहीं होती थी, गर्मियों में तुम मुझे रात भर पंखा झलती, अब नींद में उस पंखे की शीतल चर्र चर्र भी नहीं होगी! वो जुग जुग जीने का आशीर्वाद नहीं होगा, वो अपरिमित अथाह प्यार, उन झुर्रियों से मिलते उत्साह का संचार नहीं होगा! अब जब तुम नहीं हो, तो कितना कुछ नहीं होगा! अब तो सिर्फ़ तुम्हारी अनंत यादें होंगी, घर में तो नहीं, पर मन में गूँजती तुम्हारी आवाज़ें होंगी, हरदम तुम्हारे संघर्षों की बातें, ना जाने कैसे बिन तुम्हारे ये दिन-रातें होंगी! पता है, धीरे धीरे आदत लग जाएगी, तुम्हारे अनुपस्थिति की, पर ये आदत भी तुमसे खिलाफत होगी, हमेशा की तरह इस बार भी माफ़ कर देना तुम, इस से बड़ी और क्या राहत होगी! क्या लिखूँ ,कैसे और कितना लिखूँ , काँप रही हैं उँगलियाँ थर्रा जाता हूँ ये सोचकर, तुम नहीं होगी अब, अब कितना कुछ नहीं होगा! 

एक अधूरी कविता

एक अधूरी प्रेम कहानी अधूरी क्यों होती है? शायद लेखक और लिखना न चाहता हो, या स्याही ख़तम हो गई, या पन्ने, समय भी तो ख़त्म हो जाता है कभी कभी, एक अधूरी कहानी के अधुरे होने की, कहानियाँ भी बहुत होती हैं! किरदार बदल जाते हैं, कभी व्यवहार बदल जाते हैं, कहानियों में बहुत कुछ है, जो हर बार बदल जाते हैं, इन बदलते चीज़ों के बदल जाने की, निशानियाँ भी बहुत होती हैं! लेखक और किरदार ही दोषी क्यूँ, एक ज़माना भी तो है, कहानियों के अन्तिम पन्ने चुराने वाला, प्रेम-पुस्तक को दीमक बन खाने वाला, छद्म अभिमान के तडिताघात में झुलसी, जवानियाँ भी बहुत होती हैं! अनगिनत कारण हैं कि एक अधूरी प्रेम कहानी , अधूरी होती है!

नींद में

कभी कभी देखता हूँ ख़ुद को, बड़ी उँचाई से गिरते हुए, जैसे हो कोई पहाड़ की चोटी, या अँधे मोड़ पर कोई गहरी घाटी, ना सिर्फ़ देखता, बल्कि महसूस भी करता, और गिरता भी हूँ! ना, मयकश नहीं हूँ मैं! हाँ, गिरता हुआ, जब मैं तुमसे बातें कर रहा हूँ, जब हँस रहा हूँ, हवा में हूँ अभी भी, और नीचें, और नीचें ढहता जा रहा हूँ, आधारहीन मैं गिरता जा रहा हूँ! उपर उठने की जल्दीबाजी में, इंसान फिसल ही जाता है! अब समतल का इंतज़ार है, ताकि फिर से उठूँ, पूरा गिर चुकने के बाद! समतल, क्यूँकि मध्य से इन्सान तो वापस नहीं उठ सकता, कम से कम इंसान तो नहीं उठ सकता, ऐसा सिर्फ़ सपनों में होता हैं! पता नहीं, मैं कहाँ हूँ!

टाइम बम

6 अगस्त 1945, अमेरिका ने जापान पर लिटिल बॉय गिराया! मानवता के इतिहास का तब तक का सबसे ख़तरनाक बम! पूरा शहर राख हो गया, लाखों लोग मरे और बम का असर इतना ख़तरनाक की आज 70 साल से अधिक हो गए फिर भी विकलांग बच्चे पैदा होते हैं! आजकल कुछ लोग बोल रहे हैं कि हमें ग़लत इतिहास पढ़ाया जा रहा हैं! मुझे भी लगता हैं कि हमें ग़लत इतिहास पढ़ाया जा रहा हैं!  हमें बताया जाता है कि हिरोशिमा नागासाकी पर जो बम गिरा था वो सबसे ख़तरनाक बम था! लेकिन एक बम तो इंडिया पर भी गिरा था, 30 दिसंबर 1906 को! अँग्रेजी सरकार का गिराया हुआ बम, ऑल इंडिया मुसलिम लीग! देश धरम के नाम पर बँटना शुरू हुआ!  धर्म के नाम पर लड़ाइयाँ शुरू हुई........ बम इतना ख़तरनाक था कि उसके असर से लोग आज भी मर रहे हैं, वैचारिक रूप से विक्षिप्त लोग पैदा हो रहे हैं! जापान वाले बम का असर शायद अगले 50-100-150 या 200 सालों में ख़तम हो जाए, इंडिया वाले बम का असर तो इंडिया की मौत के साथ ही ख़तम होगा!

Handful डॉक्टर-इंजीनियर-IAS

हमारे यहाँ माँ-बाप बच्चों को जूते का फीता बाँधना भले ही बाद में बताते हैं लेकिन डॉक्टर,इंजीनियर(IIT वाला) ,IAS/IPS बनने के फ़ायदे पहले बता देते हैं! एक छोटे से शहर के किसी मिडिल क्लास फैमिली का लौंडा, जो पढ़ने में थोड़ा भी ठीक ठाक हो (या ना भी हो),  बचपन से ही उसकी फीडिंग इस तरह से होती है, इन तीनों प्रोफ़ेशन का ऐसा भौकाल उसके आस पास तैयार किय़ा जाता हैं कि उसका अपरिपक्व दिमाग़ इनमें से ही किसी एक को आगे जाने के लिए चुन लेता है! आप 10 से 16-17 साल तक के बच्चों से पुछिये उसे क्या बनना है, 90% यही रटा रटाया जवाब देंगे! मजेदार बात ये हैं कि डॉक्टर-इंजीनियर बनने की चाह रखने वाले 90% से भी अधिक ये नहीं बन पाते! जो कुछ लोग बन जाते हैं, उनमें से भी कइयों को बाद में एहसास होता हैं कि ये किस लाइन में आ गए हम? हमें तो कुछ करना पसंद हैं! (Bank में नौकरी करने वाले इंजीनियर दिल पर ना लें) शायद ये भी एक कारण हैं कि हमारा इंडिया global happiness index में 155 देशों की लिस्ट में 122वें स्थान पर है! ये लिखने के पहले मैं अपने बारे में सोच रहा था! बनना मुझे डॉक्टर था, ग्रेजुएशन मैं geology से कर...

ये कूलनेस नहीं आसां

जन्मजात हिन्दी परिवेश और हिन्दी मीडियम से बेलोंग करनेवाले हम लौंडे चाहें "marvel स्टूडियोज" का सबटाइटल वाला चुरन कितना भी फांक ले, पर अँग्रेजी ज्ञान का कॉन्सटिपेशन शायद ही कभी ख़तम होगा हमारा!  इसीलिए जब भी कभी नया फोन खरीदते या फोन फॉरमेट हो जाता है तो फोन वापस हाथ में आते ही जीवन का एकसुत्री लक्ष्य होता है गूगल ट्रांसलेट इंस्टॉल करना! ये बातें हम इसलिए बता रहे हैं क्यूँकि थोड़ी देर पहले बड़ी ही विकट परिस्थिति आ गई थी हमारे सामने। किसी ने हमारे सामने, हमारे ही स्टाइल में देवानगरी फॉन्ट में अंग्रेजी चेप दिया! सेन्टेंस था - "विथ इम्फिसिस अॉफ एव्री सिलेबल" साला इतने छोटे सेन्टेंस में भी हमें सिर्फ विथ, अॉफ, और एव्री का ही मतलब पता था, और बाकि दोनो का तो स्पेलिंग भी नहीं पता! फिर हम गए गूगल ट्रांसलेट जी की शरण में, लेकिन वो ससुरा भी ग़लत स्पेलिंग के चलते मीनिंग नहीं बताया। बड़ी भयानक समस्या आ गई थी! लेकिन हम भईया लोग बड़े क्रिएटिव होते हैं! हम तुरंत कीबोर्ड सेटिंग में ऑटो करेक्ट ऑन किए, और कोशिश किए "विथ इम्फिसिस अॉफ एव्री सिलेबल" लिखने का, आईडिया सही था,स्...

बिहार से तिहाड़: फर्जी समीक्षा

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आज मैं नेपाल में हूँ, बाहर बारिश हो रही है, काफ़ी रोमांटिक मौसम हैं, प्यार वाला फील देने वाला! और मैं गर्लफ्रेंडाभाव में "बिहार से तिहाड़" पढ़ रहा हूँ अकेले बैठे-बैठे। बिहार से तिहाड़ कथित तौर पर "हर घर अफ़ज़ल" योजना के जनक, "आजादी" फेम क्रांतिवीर कन्हैया कुमार जी की ऑटोबायोग्राफी है। ये किताब कहानी है गाँव के अभावों से निकले एक बच्चे और उसके संघर्ष की, जो एक दिन हर news चैनल के प्राइम टाईम का मुद्दा बन गया था! 244 पन्नों की यह किताब 5 हिस्सों में बँटी हुई हैं-बचपन, पटना, दिल्ली, JNU, और तिहाड़! बचपन की कहानी कन्हैया के संघर्षों की कहानी है। बिहार के एक छोटे से गाँव में रहने वाले ग़रीब परिवार को किन किन दुष्वारियों का सामना करना पड़ता है, इसका बड़ा ही सजीव वर्णन कन्हैया ने काफ़ी आसान भाषा में किय़ा है! अगर आप लोअर मिडिल क्लास से हैं तो आप कन्हैया के बचपन के दिनों से काफ़ी जुड़ाव महसूस करेंगे, इसे पढ़ते हुए आपको लगेगा कि कहीं ना कहीं आपने भी इस पल को जिया है। बचपन में पैसों के अभाव में भी कन्हैया के संघर्षपूर्ण पढ़ाई की कहानी सच में प्रेरणादायक हैं। एक जगह कन्हैया ने...

स्वच्छ भारत का चश्मा

आज तड़के सुबह फरजिवाल जी ने एक प्रेस कॅान्फ्रेंस आयोजित की। जब हम प्रेस कोन्फ़्रेन्स में पहुँचे तब फ़र्ज़िवाल जी मफ्लर बान्ध पहले से ही वहाँ धरने वाली मुद्रा में बैठ ‘भगवान का शैतान से हों भाइचारा’ का लिरीक्स याद कर रहे थे! हमारे वहाँ पहुचने के बाद उन्हों ने मीडिया को सम्बोधित करते हुए कहा कि आज हम यहाँ एक बड़ा खूलासा करने के लिये एकत्रित हुए हैं। “मैं देश की जनता को बताना चाहता हूँ कि स्वच्छ भारत के पोस्टर में गाँधी जी के चश्मे के नाम पर जो गोल फ़्रेम वाला चश्मा इस्तेमाल हो रह है, वो असल में गाँधी जी का है ही नही, वो चश्मा हॅरी पॅाटर का है। मोदीजी जब 2015 में इंग्लैंड गए थे, वहीं से उन्होंने अपने काले धन से वो चश्मा खरीदा था।” जब हमारे रिपोर्टर ने इसका सबूत माँगा तब श्री फरजिवाल जी ने जवाब दिया की “मैं इमानदार आदमी हूँ, मुझे सबूत देने की आवश्यकता नहीं है।” इतना कहकर वे अपने झाड़ू पर बैठकर जंतर मंतर की ओर उड़ गए। BJP के बड़े नेता ने इस आरोप पर सफाई देते हुए कहा कि, “हो सकता है कि हॅरी पॅाटर ने अपना चश्मा मोदीजी को गिफ्ट में दिया हो, हम इससे इनकार नहीं कर सकते, क्योंकि जनता मोदीजी को बहुत ...